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19 November 2018

इंसानी जानों की हिफ़ाज़त आज की दुनिया का सब से बड़ा चैलेंज है। -मुफ़्ती मुहम्मद किताबुद्दीन रिज़वी


खानकाह अरिफिया, सय्यद सरावां में 'अमन शांति का पैग़ाम इन्सानियत के नाम' के उन्वान से "रह्मतुल्लिल आलमीन कांफ्रेंस" का आयोजन और पैग़म्बर इस्लाम की जीवनी की रौशनी में मानवता को बढ़ावा देने के लिए उलमा के बयानात
आज की दुनिया में मज़हब, इलाक़ा, रंग नस्ल और ज़ात-पात के नाम पर जिस बे-रहमी से इंसानी ख़ून को बहाया जा रहा है वो हम सब के लिए बहुत चिंता का विषय है। क़ुरान ने एक जान के नाहक़ क़त्ल को पूरी इंसानियत का क़त्ल कहा है। और नाहक़ क़त्ल की वारदात को रोकने के लिए क़िसास (बदला) को ज़िन्दगी बताया है। क़िसास के क़ानून के तहत क़ातिल को क़त्ल के बदले क़त्ल की सज़ा दी जाये तो क़त्ल के बढ़ते वारदात पर आसानी से रोक लगाई जा सकती है। आज पूरी दुनिया में क़त्ल आम जारी है। वजह ये है की अलग अलग क़ौमों के बीच नफरतें बढ़ गई हैं और हुकूमतों ने अद्ल इंसाफ छोड़ रखा है। ज़ालिमों की हिमायत और मज़लूमों के साथ नाइंसाफ़ी की वजह से पूरी दुनिया ख़ूनी वारदात से भर गई है। ऐसी सूरत में ज़रूरी हो गया है के पैग़म्बर की जीवनी का अध्ययन किया जाये और पूरी दुनिया में बिना किसी भी भेद भाव के इंसाफ पसंद सिस्टम कायम किया जाये। इन ख़यालात का इज़हार मुफ़्ती मुहम्मद किताबुद्दीन रिज़वी, नाइब प्रिंसिपल जामिया अरिफिया, सय्यद सरावां ने अपने ख़िताब में किया।

खानकाह में हर साल मिलादुन्नबी के मौके पर 'अमन शांति का पैग़ाम इन्सानियत के नाम' के उन्वान से रह्मतुल्लिल अलमीन कांफ्रेंस की जाती है, जिस में मुस्लिमों के साथ-साथ बड़ी तादाद में ग़ैर मुस्लिम भाई भी शामिल होते हैं। हर साल की तरह इस साल भी ये प्रोग्राम बड़े धूम धाम से मनाया गया।
 क़ारी कलीमुल्लाह सईदी, अध्यापक जामिया अरिफिया के क़ुरान पाक की तिलावत से मह्फ़िल की शुरुआत हुयी। उसके बाद विद्यार्थी मुहम्मद मतलूब ज़फ़र ने इस्लाम के पैग़म्बर की शान में नात पेश किया।
खतीबुस्सुफिया मौलाना 'आरिफ इकबाल मिस्बाही' ने सीरत के नैतिक पहलुओं पर गुफ्तगू की, उन्हों ने पैग़म्बर अलैहिस्सलाम की जीवनी की रौशनी में बताया की अच्छा मुस्लमान वो है जो अखलाक़ी ऐतिबार से अच्छा हो और उसके नैतिकता का दायरा सिर्फ समाज और दोस्तों तक सीमित ना हो, बल्कि अपने घर के अन्दर भी वो अच्छा सुलूक और अछे ढंग से पेश आता हो, बीवी बच्चों को खुश रखता हो और घरेलु काम काज में हाथ बटाता हो, यही पैग़म्बर की तालीम है और यही उनकी करनी किरदार है।

मौलाना 'ज़ीशान अहमद मिस्बाही', अध्यापक जामिया अरिफिया ने कहा की अल्लाह के रसूल अल्लाह के बन्दों तक दीन पहुँचाने वाले बन कर आये, दारोगा बन कर नहीं। इस लिए हर मुसलमान को भी सिर्फ मज़हब की बात फैलानी चाहिए दारोगा गिरी नहीं करनी चाहिए। सारे मसाइल उसी वक़्त पैदा होते हैं जब हम अपनी बात दूसरों से मनवाना शुरू कर देते हैं। अगर हम अपनी बात कह कर दूसरों को मानने ना मानने की आज़ादी दे दें, तो दुनिया में अमन शांती कायम हो जाएगी। मज़हब में ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं। और तुम्हारा मज़हब तुम्हारे साथ, हमारा मज़हब हमारे साथ फरमा कर क़ुरान ने हमें उसी तर्ज़ ज़िन्दगी की दावत दी है। इसी तर्ज़ ज़िन्दगी को हम अपना लें तो अंतरधार्मिक एकता भी पैदा हो जाएगी और मस्लकों के दरम्यान जो झगडे हैं उन का भी अंत हो जायेगा।
खानकाह अरिफिया के सज्जादा नशीन दाई इस्लाम शेख अबू सईद शाह एह्सानुल्लाह मुहम्मदी सफवी की दुआ पर प्रोग्राम की समाप्ति हुयी। उसके बाद शाह सफी मेमोरियल ट्रस्ट की तरफ से लोगों की मेहमान नवाजी की गई और इंसानियत मुहब्बत की सीख ले कर लोग ख़ुशी ख़ुशी घर वापस हुए।

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